Thursday, May 24, 2018

।।बेलिबास रूह-ए- इश्क।।

Writer, Director, Poet Rajnish BaBa Mehta

लहजों में लिपटी, सांसों में सिमटी छोटी सी तस्वीर थी 
गलियों के मुहाने पर खड़ी, ना जाने किसकी तकदीर थी ।।

लफ्ज लाल लिए होठों पर ,किसी के इश्क का इज़हार थी 
घूंघट में बैठी बंद दरवाजों पर, ना जाने किसका इश्तहार थी ।।

दस्ते-हिनाई की तराशों तले, तन्हाई में भी वफाई की मीनार थी 
रोक ली दबती आहों के तले सांसें, ना जाने आज क्यूं बीमार थी ।।

सख्त पत्थर सा लिए बदन,खुद के लिए, खुद ही वो एक विचार थी 
बेलिबास कोनों में सिमटी सिसकती ,ना जाने आज क्यूं लाचार थी ।।

यादों की स्याही तले खोली है आंखें, लेकिन मुझसे अब भी वो तकरार थी 
बिखेर दी अपनी जिस्म की कहानी,ना जाने क्यूं आज वो भरे बाजार की अखबार थी ।।

सच्ची साज पर नंगे पांव चलकर , मुमताज सी ताजमहल बनने को बेकरार थी
अंधेरी कासनी रातों में नंगी रूह लिए,अब ना जाने क्यूं मेरी कब्र में भी समाने को तैयार थी ।। 

क़ातिब
रजनीश बाबा मेहता 

Wednesday, May 2, 2018

।। बेलिहाज़ रूख़सती।।

POET, DIRECTOR RAJNISH BABA MEHTA


सिलते लफ़्ज़ों की है, अकेली ख़्वाहिश वाली ख़ामोश ख़ुदाई 
बनते ज़ख़्म नासूर है, जो देखा, तेरी अश्कों के शीशों में दस्ते-हिनाई
सजे पैरहन तराशे बदन पर लिए, नंगे पांव जो तू सामने इठलाई 
रूठी होठों औऱ झुकती पलकों पर, ना जाने क्यों ना आई रूसवाई 
ज़ंजीरे-दर में जकड़ा हूं, सन्नाटों की शोर में बैठा हूं, लेकिन शिकन माथे ना आई
महफ़िल-ए-रात की रोती सन्नाटों पर, अब क्यों बेबसी सी है छाई ।।

फ़जर की फिक्र में बैठा हूं, जो तेरी रूख़सती का वक्त आएगा 
ठहर कर सूरज भी तेरे कदमों तले, धूप सी हल्की आह ना भर पाएगा 
बेगानेपन की तस्वीर लिए, वो कहार भी मोम सा यूं हीं पिघल जाएगा 
कल तक साथ चलने वाला हमसफर, पिछली गलियों में ग़ुम जाएगा
रोज की तरह हर-रोज, तेरा वक्त खुद-ब-खुद ख्वाहिश सी निकल आएगा 
उस रोज बेलिहाज़ होकर, ये शख्स तेरी आगोश में फिर से सिमट जाएगा।।

पराए वक्त में जो मैंने तुझको पा लिया, क़ल्ब से मैं खुद ही ख़ुदा हो गया 
खामोंश लम्हा यूं ही बोलता गया,धीरे-धीरे मैं तेरे जिस्म से यू हीं ज़ुदा हो गया
अबस फितरत--फांस में, जो तेरा रंग परिंदा सा फक़ीरियत हो जाएगा 
उंगलियों पर गिनते लम्हों के बाद,अब कयामत के रोज ही मुलाकात हो पाएगा।।
तब ना सूरत--साज का ज़िक्र होगा, ना तेरी ख़ामोश रूख़सती का फ़िक्र होगा 
क्योंकि बेलिबास रूह के दरवाजों पर, सिर्फ ज़िंदा ईश्क--फ़साना सुनाया जाएगा।

क़ातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

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।।दस्ते-हिनाई-मेंहदी वाले हाथ।। पैरहन- वस्त्र ।। ज़ंजीरे-दर- दरवाज़े कि साँकल।।क़ल्ब= मन,आत्मा।।
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Tuesday, March 27, 2018

।। किस्सा थोड़ी बदनाम सी है ।।

Writer Director Rajnish BaBa Mehta 

बंदिशों की धागों पर शहर की शाम सी है
किस्सा गुलाबी होठों की थोड़ी बदनाम सी है ।।
लो सुनाता हूं नज़्म--नाश वो थोड़ी आम सी है 
वो महरू़म शक्ल क्या देखी ग़िर्द आईनों में
पूरा जिस्म लिए अकेली, वो थोड़ी बदनाम सी है।।

रिश्तों की गिरहों को रास्तों पर खुलते देखा था उस रोज 
पहलुओं में पत्थरों को हर बार फिसलते देखा था उस रोज 
अफसोस के इरादो में, ज़िद जश्न की तरह जाने क्यूं मनाती रही 
ग़म आंखों से नहीं, आंसू सांसों से पीती रही हर रोज ।।

वक्त है नुमाईश की, लेकिन खुद की आजमाईश होगी एक रोज 
नफ़्स है हथेली पर लेकिन जिस्म से बदनाम क्यों होती रोज रोज 
देखना खुले पैमाने पर , पयाम तले बंद आंखे लिए डूबेगी एक रोज 
फिर ना रात रोएगी, ना हुस्न का जश्न होगा, लेकिन मौत होगी किसी रोज।। 

बंद अंधियारे छोटी दीवारों में अबस, आखिरी नसीब भी नासबूर सी है 
निस्बत की खोज में रोती रूह के तले , भीड़ में वो अकेली जिस्म सी है  
रोती सिसकती बंद गलियों में अकेले , लिबास ओढ़े मगर रूह नंगी सी है
ख़त्म हुई ख़्वाहिश,खुद को खोजती ख़ामोश ख़लिश की तरह खुदा के तले 
अब क्या, ठहरता वक्त भी हुआ पराया ,अपनो का बचा ना कोई साया, 
फिर भी ना जाने क्यों, आज भी वो, थोड़ी- थोड़ी बदनाम सी है  

क़ातिब 
रजनीश बाबा मेहता 


।।नज़्म--नाशबर्बादी की सुरीली दास्तान।।गिर्द= गोल।।नफ़्स= आत्मा।।नासबूर= अधीर ।।निस्बत= सम्बन्ध।।


Wednesday, February 21, 2018

।। बता देता है।।

Writer, Director & Poet Rajnish BaBa Mehta 



।। बता देता है।।

 सत्ता में सुख सामर्थ की नींव हिला देता है। 
सच्चा इश्क इंसानों के जज्बातों की नींव हिला देता है।
छोटे दिलासे, रहनुमाओं को राह पल भर में दिखा देता है।
मिला था हिमालय की तराई में उस सारंगी वाले जोगी से 
जो पलभर में बंद कर आंखें, कंकड़ में शंकर दिखा देता है।।

अफसोस के इस अफसानों में, हर कोई स्याही दिखा देता है। 
रात के रास्तों पर मिलो, तो खुद के गमों का मंजर बता देता है। 
नासाफ़ सा दिल लिए चलकर भी वो, ज़ियारत की दहलीज मांगता है 
गैरत की महफिल में गम्माज़ बनकर फिरता रहता है तख्त की फिराक में 
जब पकड़ा जाता है रंगे हाथों , तो वो घुटनों के बल मौत की दुआ मांग लेता है।।

तरान--ज़िंदगी राख बनकर सांसों मे पेवस्त हुई बेवजह बता कर , 
नंगे कदमों की आहटों को अनसुना किया शोर को वजह बता कर ,
फितरत थी उसकी बातों में, जो ज़मीर बेचती थी फ़लक बता कर ,
लो चला है आखिरी रास्तों में राम लिए, जो आखिरी शाम का पता बता देता है 
अबस झूठ ना कहना आखिरी लम्हों में, वरना कब्र भी अंधेरों का पता बता देता है  
क़ातिब 
रजनीश बाबा मेहता 
नासाफ़= गन्दा, अशुद्ध, अपवित्र।। क़ायदा= रीति, नियम,।।गम्माज़ -चुगलीबाज़।।ज़मीर= मन, हृदय।।फ़लक= आकाश, स्वर्ग।।

Thursday, February 1, 2018

।।मगरूर मोहब्बत।।

Poet, Writer, Director Rajnish BaBa Mehta

सब कुछ कह दिया, दिल--अंजाम से पहले-पहले
मगरूर थे मोहब्बत में हम, नाकाम से पहले-पहले।।
सर्द रातों में चादर का कोना लपेटे लेटे रहे 
धीरे धीरे धड़कने बंद होने लगी, सुबह की शाम से पहले-पहले।।
अब जीने नहीं देती तेरी रूसवाई 
मेरी ख्वाहिश को जगा दे, मेरे मरने से पहले-पहले।।

फिक्र ही फिक्र तो किया था, खुद के जिक्र में इक रोज 
गेसू तले सोती सिसकती रही, पामाल सी थी वो उस रोज ।।
बहते रक्त की रंजिश ना थी, अब बस खामोशियां है हर रोज ,
वादा है ये तूझसे, अल्फाजों में अब ना उलझाउंगा किसी रोज ।।
आखिरी ज़नाजे की ज़ियारत--जिक्र जैसी महफिल तो होगी
लेकिन आंसूओं में डूबी बारात ना होगी, बस तन्हा हमरात होगी हर रोज।।

इश्क अश्कों में छुपाकर, ज़फा-ए-जीत से मिली पहले-पहले
ले जाउंगा तेरी शहर से वो यादें, जो मिली मुझे उम्र से पहले-पहले 
छोड़ ये आखिरी ज़ेहन, खो जा मेरी आगोश में सिमटने से पहले -पहले 
दस्तक बेधड़क होने लगी है अब, सीधी छत के छोटे दरवाजों पर,
लो,
अबस होने लगी बंद ज़ुबां,बंद होने लगी आंखें, तेरी मौत से पहले -पहले ।
आना कभी मेरी कब्र के सिराहने तले, इश्कज़दा होना मगर रोने से पहले-पहले।।

क़ातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

शब्दार्थ
।।गेसू= लटाएं, केशों के छल्ले।।पामाल= पैरों के नीचे कुचला हुआ।।जफ़ा= अन्याय।।ज़ियारत= तीर्थयात्रा।।

Sunday, November 26, 2017

शिव - शक्ति या मुक्ति

Writer, Director & Poet Rajnish BaBa Mehta

हाथ में सारंगी, जिस्म पर नारंगी 
सतरंगी दुनिया में साधु ,ज़ेहन से पूरी नंगी 
फैसला था खुद का, फासलों का डर नहीं 
नाचती मौत के सामने, खड़ा सबसे बड़ा भंगी। 

नादान बन राह नापता, बन हिमालय का सतसंगी 
भोर होता जटा समेटता, फिर कहलाता मैं तेरा मलंगी
राह चली जोगन मेरे साथ, कहती वो, तू शिव,मैं तेरी शिवांगी 
पहुंचा कैलाश, रख सारंगी, तूझे सुनने तो आतुर है, ये केसरिया बजरंगी 

बजा है डमरू, लगी है तान, 
गूंज उठा मानसरोवर का अभिमान।

मैं शिव हूं, या शव हूं,  तेरे सोच की मुक्ति हूं 
नीले बदन तले तेरे संसार में, एक ही शक्ति हूं 
राख वाले लिबास ओढ़े सुन, मैं ही तेरी भक्ति हूं 
तू बजा शंख, दे अजान, रह गया आखिर तक तू अनजान 
बंद आंखों से अब देख जरा, शमशान की आखिरी छोड़ पर खड़ा 
मैं ही तेरी भक्ति हूं, मैं ही तेरी शक्ति हूं, मैं हीं तेरी मुक्ति हूं। 
                                क़ातिब 

                              रजनीश बाबा मेहता 

Wednesday, August 30, 2017

।।वो आंगन अच्छा नहीं, जिस आंगन बच्चा नहीं।।

writer , Director Rajnish baba mehta
गोरखपुर में बच्चों की मौत पर हृदय वेदना से भर गया
मैं किसी को समझा नहीं सकता ना किसी को रोक सकता हूं 
बस शब्दों के जरिए व्यक्त जरूर कर सकता हूं 



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शहर--ख़ाक निकला है गलियों के गोशे से 
देखो जरा राख निकला है जिस्मों के पेशे से 
निगाह--नाज जो पहली मिली फरिश्तों के मेले से 
तू बचा ना पाया नन्हें कदमों को मौत--महफिल से
हवाओं की बंदिश पर जो झुलसता रहा रूकती सांसों से।।

कहां गया तू मेरा बचपन खराब करके, हमारी मौत उधार लेके
कब्र के कोनों से सुना था,आया तू मातम मनाने वो भी खुशियां खरीदके।
मिट्टी के खिलौने सा ख्वाब तराशा है तूने, वो भी इंसा को गिरवी रखके 
लिया है शाप तूने दीवारों की खातिर, अब गिरेगी साख तेरी वो भी राख बनके ।।   

 पूछ लेना खुद कभी अपने आंगन में बड़े-बूढ़ों के सिराहने से 
लफ्ज ना आएगी, बस एहसास की आखिरी आवाज होगी उसकी रूह से
 कि 
कोई दर कभी अच्छा ना होगा , ना कोई आंगन सच्चा होगा
अगर दहलीज पर खेलने वाला कोई मासूम बच्चा ना होगा ।।


।।गोशे- कोना।।

क़ातिब 

रजनीश बाबा मेहता