Tuesday, July 18, 2017

।।रहगुज़र।।

Rajnish BaBa Mehta
Writer,Director


रिश्तों पर रोशनी रख रहगुज़र
वरना वफा परिंदा सा हो जाएगा 
रास्तों पर रिश्तों को ना आने दे रहगुज़र 
वरना वक्त की रेत में तू राख सा हो जाएगा।

अंधेरी कासनी रातों में तू डर, खुद के ख्यालों से 
वरना मांग ना पाएगा तू अपना जिस्म रहमवालों से 
जब असफ़ार--ज़नाजा निकलेगी रोती गलियों से एक बार 
जलता जिस्म बचा ना पाएगा, कब्रिस्तानों के रखवालों से। 

ऐहतमाम रख तू, जो अगर चला कभी बेवफाई के कबीलों में 
उक़ूबत सहने की औकात रख, अगर ज़िक्र हुआ तेरा फकीरों के मेलों में 
ना दुहाई देना फिर अपने फ़िदाई के फासलों की ,अमीरों की महफिल में 
जब हिसाब होगा गुनाह--इश्क का,जब रश्क होगा तेरी आंखों में इश्क का 
ज़िक्र--आम तो होगा तेरा, लेकिन जगह होगा वो कयामत की जेलों में ।। 

अब सोच को सच्ची साज़ दे, अपनी जिस्म को रूह वाली हल्की आवाज दे 
फिक्र की गलियों का जिक्र छोड़, अपनी ज़िंदा जिस्म में थोड़ी जान तो फूंक दे।।
बस ख्याल रखना रिश्तों का रहगुज़र, वरना वफा परिंदा सा हो जाएगा 
अगर रास्ते पर आए रिश्ते, तो तू फिर वक्त की रेत में राख सा हो जाएगा।।

क़ातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

असफ़ार= सफर।।ऐहतमाम= व्यवस्था।।उक़ूबत= यातना।।फ़िदाई-प्रेमिका।।

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