Wednesday, August 9, 2017

गर्दिश-ए-रंग-ए-चमन

दुनिया के सबसे बड़े कब्रिस्तान वादी-अल-सलाम पर रजनीश बाबा मेहता की कविताएं


रोशनी है गर्दिश जैसी, अंधेरा है मुर्दिश जैसी 
चमन में रंग नहीं हल्की भी, फिर ये शोर कैसी
धुआंओं का जश्न फैली, आहटों के सन्नाटें जैसी 
रेंग रही काला आसमान, सर के उपर मातम जैसी ।। 

आखिरी कदम की मंजिल पर बैठा बेफिक्रा बनकर 
रास्तों की नींव हुई हल्की तो फिर ये ख्वाहिश कैसी
हाथों की लकीरों को लाल कर, खून जो आई माथे पर छनकर
किस्मत का कोरा कागज लिए फिर ये जीने की हसरतें कैसी ।।

जो चार जणा मिल छोड़ गया तू, मस्तक पर पूरी राख मल गया तू
अफसोस की जंजीर लिए, आएगा एक आखिरी बार जरूर तू 
उस रोज मुलाकात होगी मेरी तेरी, पता नहीं आज क्यों गुरूर कर गया तू
लो वक्त ने ले ली करवट, समेटकर जिस्म अब क्यों सिसक रहा है तू।।

आज है तू चांद सी राह पर, दे रहा हूं अपना पता तेरी हस्ती छोड़कर-भूलकर  
बसता हूं मैं इराक--नजफ की वादी-अल-सलाम की पहली मोड़ पर
क्यूं खड़ा है अब बाहर, क्या अब भी उम्मीद का पैमाना टूटा नहीं मरकर 
जाओ, बसता हूं मैं इराक--नजफ की वादी-अल-सलाम की पहली मोड़ पर

क़ातिब 
रजनीश बाबा मेहता 

।।वादी-अल-सलाम- इराक के नजफ में दुनिया के सबसे बड़े कब्रिस्तान का नाम है।।नजफ- इराक का एक शहर ।।


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